Monday, 28 October 2019
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास।।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था।
इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।
डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरंगजेब ने प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था। आज उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज ब्राह्मण है।
सन् 1752 से लेकर सन् 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होलकर ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किए। 7 अगस्त 1770 ई. में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया, परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया। 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था।
अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।
सन् 1809 में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मंडप का क्षेत्र है जिसे आजकल ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने 'वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल' को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया।
इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं। मोहम्मद तुगलक (1325) के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब 'विविध कल्प तीर्थ' में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी लिखा है कि फिरोजशाह तुगलक के समय कुछ मंदिर मस्जिद में तब्दील हुए थे। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक 'तीर्थ चिंतामणि' में वर्णन किया है कि अविमुक्तेश्वर और विशेश्वर एक ही लिंग है।
विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो का अनुसंधान )
October 28, 2019
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विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो का अनुसंधान )
■ क्रति = सैकन्ड का 34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुति = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुति = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 76 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महाकाल = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )
सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।
तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।
चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।
पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।
छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।
सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।
आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।
नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।
दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।
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🌷 आनंद ही आनंद है 🌷
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■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
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सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
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तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
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तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
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तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
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चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
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चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
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चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।
पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।
छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।
सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
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सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।
आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।
नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।
दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
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दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।
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Friday, 11 October 2019
पड़ोसी गाव पटकनिया : अपना गांव, अपना पहचान - गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश
October 11, 2019
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अपना गांव (पटकनियां) #गाजीपुर जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी की दूरी पर बसा-बसाया गया है। यह #जमानिया तहसील के रेवतीपुर ब्लाक और सुहवल न्याय पंचायत का प्रमुख गांव है। अपने गांव का इतिहास करीब 250 साल पुराना है। इसके बसावट को देखकर पता लगाया जा सकता है कि यहां लोग जैसे-जैसे बाहर से आते गए वैसे ही बसते चले गए हैं। यहां भिन्न जाति के लोगों को भी एक ही टोला में पा सकते हैं। यहां अधिकांश आबादी बाहर से आकर बसी है।
जानकारों का कहना है कि अपना गांव सुहवल का एक डेरा हुआ करता था। जो आगे चलकर पटकनिया मौजा के नाम से जाना गया। अपने गांव की सीमा पूरब में रेवतीपुर गांव से कटकर बने कल्याणपुर गांव से लगती है, पश्चिम में युवराजपुर, दक्षिण में अररिया व गौरा और सुदूर उत्तर में गंगा नदी हैं।
पटकनिया कभी गाजीपुर लोकसभा और दिलदारनगर विधानसभा का प्रभावी गांव बनकर उभरा था। अपना गांव जिले और प्रदेश स्तर के नेताओं के निगाह के केंद्र में रहता था। नये परिसीमन के बाद अपने गांव की पहचान बगल के जिले बलिया - लोकसभा का एक छोर पर बसे अंतिम गांव और मुहम्मदाबाद विधानसभा का उस पार बसा अंतिम गांव के तौर पर हो गया है। जबकि हमारे पश्चिम में डेढ किमी दूर युवराजपुर आज भी गाजीपुर लोकसभा और जंगीपुर विधानसभा के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु बना हुआ है। वर्तमान में अपने गांव में 5000 से ज्यादा मतदाता होने के बावजूद भी सभी राजनीतिक दलों के लिए अछूत बन गया है। इसलिए यहां विकास कोसो दूर होता जा रहा है। यह हम सभी के लिए सोचनिय विषय है।
भौगोलिक तौर पर देखें तो अपना गांव गंगा के बहने के स्थान परिवर्तन और नदी द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी के भू-भाग पर बसा हुआ है। कभी यह कुश, राढ़ी, सरपत (पतलो), बबूल और मदार का घना जंगली सा इलाका था। यहां बसने वाले हमारे पूर्वज इन जंगलों को साफ किये खेत बनाएं, घर बनाए और डेरा बनाए। आज यह पूरा क्षेत्र पटकनिया खास और गंग-बरार पटकनिया जदी के नाम से कागजों में दर्ज है। जिसमें पटकनिया खास का चकबंदी हुआ है।
अपने गांव के नामकरण को लेकर कई बातें हैं। यह सुहवल गांव सभा का पटकनिया मौजा था। वहीं पटकनिया नाम के पीछे लोग अपना ठोस तर्क देते हैं कि अपना गांव शुरू से ही पहलवानों का गांव रहा है। और, जो भी अपने को बड़ा पहलवान समझता था पटकनिया में पटकनी पाकर जाता था। एक समय ऐसा बताया जाता है कि गांव के हर टोले-मुहल्ले में अखाड़ा हुआ करता था। जहां, क्या बुजुर्ग क्या नौजवान सब पाठा थे। इस गांव की एक खासियत थी कि पहलवानी के चक्कर में हर एक परिवार से एक -दो बांड़ (बिना ब्याह) रह जाया करते थे। जिनको खलीफा, मलिकार और मालिक उपनाम दिया जाता था।
पहलवानी का नाम लेते ही अपने गांव के नामी पहलवानों की लंबी फेहरिस्त आंखों के सामने आ जाती है । उनमें स्व. श्याम लाल सिंह (दादा), स्व. गिरिजा सिंह (दादा), स्व. रामाशंकर सिंह, स्व. मंगला सिंह, स्व. कुंवर सिंह, स्व. बहसु सिंह, स्व. रघुनाथ सिंह, स्व. मुनेसर यादव, स्व. जयराम चौधरी और श्री उदयभान सिंह का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है।
जब बात स्वतंत्रता आंदोलन का आए तो उसमें भी अपना गांव जन-धन की हानि के साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। स्व. वंशनारायण मिश्र और स्व. बाबू अमर सिंह की अगुवाई में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन गांव में हुआ था। उसी दरम्यान 'भारत छोडो़ आंदोलन ' 1942 में अंग्रेजी फौज द्वारा अपने गांव के खेत, खलिहान और मकानों को जला दिया गया। महीनों अंग्रेज़ी हुकूमत ने अपने गांव के लोगों को प्रताड़ित किया था और लोगों को घर-दुआर छोड़कर गांव के सिवान और अन्य इलाकों में कई महीनों तक छिपना पड़ा था।
अंग्रेज सैनिक यहां महीनों-महीनों तक डेरा डालकर रही थी और क्रांतिकारियों को खोजती रही।
स्व. वंशनारायण मिश्र और स्व. अमर बाबू स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के अच्छे नेताओं के रुप में जाने-पहचाने गये।
अपना गांव अंग्रेजों के समय में मालगुजारी वसूलने के लिए कई जमींदारों के अधीन रहा। इसमें प्रमुख रूप से जो नाम चर्चित हुए वे - युसूफपुर खड़बा के एक बाबू साहब जिनका परिवार गाजीपुर के रीगल टाकिज से ताल्लुक रखता था, दत्ता परिवार (बंगाली), स्व. कांता सिंह और स्व. पशुपति सिंह थे। और, अपने गांव के एक कायस्थ परिवार से राम नारायण लाल कारिंदा हुआ करते थे। उस समय इनकी खेती सैकड़ो बीघे से ज्यादा में हुआ करती थी।
गांव के बड़े खेतिहरों में स्व. खीरु सिंह का भी नाम हुआ करता था। अपने गांव में एक कहावत प्रचलित है कि - नरवन में नीरु रा , पटकनिया में खीरु रा और सीताब दीयर में गरिबा रा। ये सब लोग अपने क्षेत्र के बड़े कास्तकारों में थे।
अंग्रेज़ी शासन में भी शिक्षा के क्षेत्र में अपने गांव के लोगों द्वारा भगीरथ प्रयास किया गया। स्व. जगनारायण राय और स्व. जगरनाथ सिंह मास्टर साहब जैसे लोगों ने गांव के लोगों को शिक्षित करने का अलक जगाया था।
समयोपरांत अपने गांव के श्री सुभाष तिवारी और श्री अभी नारायण सिंह कई लोगों के प्रयास से विद्यालय स्थापित किये गये। वर्तमान में श्री धनराज राय, श्री अच्छे यादव, श्री सुनिल यादव द्वारा विद्यालय संचालित किया जा रहा है। जब शिक्षा की बात होती है तो गांव के सगीना राम (वकील) का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। जो पढाई के साथ -साथ गांव के खिलाड़ियों को जरसी और खेल का सामान मुहैया कराते थे।
अपने गांव में दो सरकारी प्राथमिक पाठशाला और एक पूर्व माध्यमिक विद्यालय भी संचालित हो रहा है। साथ ही अपने गांव से करीब ढाई सौ बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए जा रहे हैं। जबकि उच्च शिक्षा और बालिका शिक्षा के लिए अपना गांव अभी भी तरस रहा है।
खेल-कूद कभी अपने गांव की एक पहचान हुआ करती थी। जब पटकनिया की टीम फुटबॉल मैदान में उतरती थी लोगों की निगाहें उन पर ठहर सी जाती थी। फुटबॉल में अपना गांव जिला चैंपियन की श्रेणी में स्थान रखता था ।
बता दें कि कर्नल संभू सिंह, स्व. मेजर बृजराज तिवारी , कर्नल लल्लन तिवारी, कैप्टन सुरेंद्र बहादुर राय और कर्नल मोतिलाल राय अपने गांव की मिट्टी में पैदा हुए।
वहीं यहां के खिलाड़ियों में श्री चेतनारायण सिंह, श्री लक्ष्मण सिंह, श्री साधु सिंह, श्री विजयमल यादव, श्री चुन्नु मिश्र और वर्तमान प्रधानपति श्री रविंद्र यादव हुआ करते थे। आज के समय में अपने गांव में खेल और उसकी व्यवस्था को लेकर क्या स्थिति है, किसी से छिपा नहीं है।
किसी जमाने में इसी खेल के बल पर सेना, रेलवे और पुलिस में सैकड़ों लोग नौकरियां पाये थे।
देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद अभी तक कई पंचायती सरकारें बन चुकी हैं। अपने गांव के पहले प्रधान स्व. अमर सिंह बने थे। उसके बाद स्व. ह्रदय नारायण सिंह, स्व. मनोहर मिश्र, स्व. घनश्याम सिंह, स्व. गुरजू यादव (अल्पकार्यकाल), देवांती देवी (अल्पकार्यकाल), श्री तेजू सिंह, उर्मिला देवी (स्व. रामध्यान यादव), श्रीमती भगमनिया देवी (श्री अवधेश यादव) और वर्तमान में श्रीमती जानकी देवी (श्री रविंद्र यादव) प्रधान बनीं हैं।
सभी प्रधानों ने स्थिति और परिस्थिति के हिसाब से गांव के प्रतिनिधि के तौर पर विकास कार्य कराए और वर्तमान प्रधान भी अपने सामर्थ्य का परिचय दे रहे हैं। आजादी के बाद अपने गांव में जो विकास कार्य होना चाहिए था वैसा अभी तक हो नहीं पाया है। इस पर गांव के नवयुवकों को चेतना चाहिए। और, अपने गांव की पहचान दबी और छिपी है उसको उभारकर जिला, प्रदेश और देश के स्तर पर ले जाने का प्रयास करना चाहिए । जो हमारे पूर्वजों ने अपने समय में हर क्षेत्र में एक स्तर तक किया है। इसके लिए हमें अपने गांव के ही इतिहास में झांकना होगा जहां से हमको अपने गांव को आगे बढ़ाने की सोंच मिलेगी। हमें जाति, धर्म, रंग, गरीबी, अमीरी, शिक्षित, अशिक्षित का भेद मिटाकर सबको एक नजर से देखना होगा। हमारी सोंच में योग्य और जरुरत मंद को ज्यादा से ज्यादा अवसर और साधन मुहैया कराने की दृष्टि होनी चाहि
ए। तभी जाकर हम अपने लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर दे पाएंगे।
जानकारों का कहना है कि अपना गांव सुहवल का एक डेरा हुआ करता था। जो आगे चलकर पटकनिया मौजा के नाम से जाना गया। अपने गांव की सीमा पूरब में रेवतीपुर गांव से कटकर बने कल्याणपुर गांव से लगती है, पश्चिम में युवराजपुर, दक्षिण में अररिया व गौरा और सुदूर उत्तर में गंगा नदी हैं।
पटकनिया कभी गाजीपुर लोकसभा और दिलदारनगर विधानसभा का प्रभावी गांव बनकर उभरा था। अपना गांव जिले और प्रदेश स्तर के नेताओं के निगाह के केंद्र में रहता था। नये परिसीमन के बाद अपने गांव की पहचान बगल के जिले बलिया - लोकसभा का एक छोर पर बसे अंतिम गांव और मुहम्मदाबाद विधानसभा का उस पार बसा अंतिम गांव के तौर पर हो गया है। जबकि हमारे पश्चिम में डेढ किमी दूर युवराजपुर आज भी गाजीपुर लोकसभा और जंगीपुर विधानसभा के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु बना हुआ है। वर्तमान में अपने गांव में 5000 से ज्यादा मतदाता होने के बावजूद भी सभी राजनीतिक दलों के लिए अछूत बन गया है। इसलिए यहां विकास कोसो दूर होता जा रहा है। यह हम सभी के लिए सोचनिय विषय है।
भौगोलिक तौर पर देखें तो अपना गांव गंगा के बहने के स्थान परिवर्तन और नदी द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी के भू-भाग पर बसा हुआ है। कभी यह कुश, राढ़ी, सरपत (पतलो), बबूल और मदार का घना जंगली सा इलाका था। यहां बसने वाले हमारे पूर्वज इन जंगलों को साफ किये खेत बनाएं, घर बनाए और डेरा बनाए। आज यह पूरा क्षेत्र पटकनिया खास और गंग-बरार पटकनिया जदी के नाम से कागजों में दर्ज है। जिसमें पटकनिया खास का चकबंदी हुआ है।
अपने गांव के नामकरण को लेकर कई बातें हैं। यह सुहवल गांव सभा का पटकनिया मौजा था। वहीं पटकनिया नाम के पीछे लोग अपना ठोस तर्क देते हैं कि अपना गांव शुरू से ही पहलवानों का गांव रहा है। और, जो भी अपने को बड़ा पहलवान समझता था पटकनिया में पटकनी पाकर जाता था। एक समय ऐसा बताया जाता है कि गांव के हर टोले-मुहल्ले में अखाड़ा हुआ करता था। जहां, क्या बुजुर्ग क्या नौजवान सब पाठा थे। इस गांव की एक खासियत थी कि पहलवानी के चक्कर में हर एक परिवार से एक -दो बांड़ (बिना ब्याह) रह जाया करते थे। जिनको खलीफा, मलिकार और मालिक उपनाम दिया जाता था।
पहलवानी का नाम लेते ही अपने गांव के नामी पहलवानों की लंबी फेहरिस्त आंखों के सामने आ जाती है । उनमें स्व. श्याम लाल सिंह (दादा), स्व. गिरिजा सिंह (दादा), स्व. रामाशंकर सिंह, स्व. मंगला सिंह, स्व. कुंवर सिंह, स्व. बहसु सिंह, स्व. रघुनाथ सिंह, स्व. मुनेसर यादव, स्व. जयराम चौधरी और श्री उदयभान सिंह का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है।
जब बात स्वतंत्रता आंदोलन का आए तो उसमें भी अपना गांव जन-धन की हानि के साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। स्व. वंशनारायण मिश्र और स्व. बाबू अमर सिंह की अगुवाई में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन गांव में हुआ था। उसी दरम्यान 'भारत छोडो़ आंदोलन ' 1942 में अंग्रेजी फौज द्वारा अपने गांव के खेत, खलिहान और मकानों को जला दिया गया। महीनों अंग्रेज़ी हुकूमत ने अपने गांव के लोगों को प्रताड़ित किया था और लोगों को घर-दुआर छोड़कर गांव के सिवान और अन्य इलाकों में कई महीनों तक छिपना पड़ा था।
अंग्रेज सैनिक यहां महीनों-महीनों तक डेरा डालकर रही थी और क्रांतिकारियों को खोजती रही।
स्व. वंशनारायण मिश्र और स्व. अमर बाबू स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के अच्छे नेताओं के रुप में जाने-पहचाने गये।
अपना गांव अंग्रेजों के समय में मालगुजारी वसूलने के लिए कई जमींदारों के अधीन रहा। इसमें प्रमुख रूप से जो नाम चर्चित हुए वे - युसूफपुर खड़बा के एक बाबू साहब जिनका परिवार गाजीपुर के रीगल टाकिज से ताल्लुक रखता था, दत्ता परिवार (बंगाली), स्व. कांता सिंह और स्व. पशुपति सिंह थे। और, अपने गांव के एक कायस्थ परिवार से राम नारायण लाल कारिंदा हुआ करते थे। उस समय इनकी खेती सैकड़ो बीघे से ज्यादा में हुआ करती थी।
गांव के बड़े खेतिहरों में स्व. खीरु सिंह का भी नाम हुआ करता था। अपने गांव में एक कहावत प्रचलित है कि - नरवन में नीरु रा , पटकनिया में खीरु रा और सीताब दीयर में गरिबा रा। ये सब लोग अपने क्षेत्र के बड़े कास्तकारों में थे।
अंग्रेज़ी शासन में भी शिक्षा के क्षेत्र में अपने गांव के लोगों द्वारा भगीरथ प्रयास किया गया। स्व. जगनारायण राय और स्व. जगरनाथ सिंह मास्टर साहब जैसे लोगों ने गांव के लोगों को शिक्षित करने का अलक जगाया था।
समयोपरांत अपने गांव के श्री सुभाष तिवारी और श्री अभी नारायण सिंह कई लोगों के प्रयास से विद्यालय स्थापित किये गये। वर्तमान में श्री धनराज राय, श्री अच्छे यादव, श्री सुनिल यादव द्वारा विद्यालय संचालित किया जा रहा है। जब शिक्षा की बात होती है तो गांव के सगीना राम (वकील) का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। जो पढाई के साथ -साथ गांव के खिलाड़ियों को जरसी और खेल का सामान मुहैया कराते थे।
अपने गांव में दो सरकारी प्राथमिक पाठशाला और एक पूर्व माध्यमिक विद्यालय भी संचालित हो रहा है। साथ ही अपने गांव से करीब ढाई सौ बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए जा रहे हैं। जबकि उच्च शिक्षा और बालिका शिक्षा के लिए अपना गांव अभी भी तरस रहा है।
खेल-कूद कभी अपने गांव की एक पहचान हुआ करती थी। जब पटकनिया की टीम फुटबॉल मैदान में उतरती थी लोगों की निगाहें उन पर ठहर सी जाती थी। फुटबॉल में अपना गांव जिला चैंपियन की श्रेणी में स्थान रखता था ।
बता दें कि कर्नल संभू सिंह, स्व. मेजर बृजराज तिवारी , कर्नल लल्लन तिवारी, कैप्टन सुरेंद्र बहादुर राय और कर्नल मोतिलाल राय अपने गांव की मिट्टी में पैदा हुए।
वहीं यहां के खिलाड़ियों में श्री चेतनारायण सिंह, श्री लक्ष्मण सिंह, श्री साधु सिंह, श्री विजयमल यादव, श्री चुन्नु मिश्र और वर्तमान प्रधानपति श्री रविंद्र यादव हुआ करते थे। आज के समय में अपने गांव में खेल और उसकी व्यवस्था को लेकर क्या स्थिति है, किसी से छिपा नहीं है।
किसी जमाने में इसी खेल के बल पर सेना, रेलवे और पुलिस में सैकड़ों लोग नौकरियां पाये थे।
देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद अभी तक कई पंचायती सरकारें बन चुकी हैं। अपने गांव के पहले प्रधान स्व. अमर सिंह बने थे। उसके बाद स्व. ह्रदय नारायण सिंह, स्व. मनोहर मिश्र, स्व. घनश्याम सिंह, स्व. गुरजू यादव (अल्पकार्यकाल), देवांती देवी (अल्पकार्यकाल), श्री तेजू सिंह, उर्मिला देवी (स्व. रामध्यान यादव), श्रीमती भगमनिया देवी (श्री अवधेश यादव) और वर्तमान में श्रीमती जानकी देवी (श्री रविंद्र यादव) प्रधान बनीं हैं।
सभी प्रधानों ने स्थिति और परिस्थिति के हिसाब से गांव के प्रतिनिधि के तौर पर विकास कार्य कराए और वर्तमान प्रधान भी अपने सामर्थ्य का परिचय दे रहे हैं। आजादी के बाद अपने गांव में जो विकास कार्य होना चाहिए था वैसा अभी तक हो नहीं पाया है। इस पर गांव के नवयुवकों को चेतना चाहिए। और, अपने गांव की पहचान दबी और छिपी है उसको उभारकर जिला, प्रदेश और देश के स्तर पर ले जाने का प्रयास करना चाहिए । जो हमारे पूर्वजों ने अपने समय में हर क्षेत्र में एक स्तर तक किया है। इसके लिए हमें अपने गांव के ही इतिहास में झांकना होगा जहां से हमको अपने गांव को आगे बढ़ाने की सोंच मिलेगी। हमें जाति, धर्म, रंग, गरीबी, अमीरी, शिक्षित, अशिक्षित का भेद मिटाकर सबको एक नजर से देखना होगा। हमारी सोंच में योग्य और जरुरत मंद को ज्यादा से ज्यादा अवसर और साधन मुहैया कराने की दृष्टि होनी चाहि
ए। तभी जाकर हम अपने लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर दे पाएंगे।
(अपने गांव के इतिहास को संजोने का एक प्रयास है। इसमें गांव के लोगों का कोई भी सुझाव सादर आमंत्रित है)
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नीतीश सिंह (काजू), पत्रकार। On Facebook -: nitish singh
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